पूर्वांचल के विकास में आगे बढ़ता चीनी उद्योग


आजमगढ़ की सठियांव चीनी मिल ने बनाए कीर्तिमान


हेमेंद्र तोमर


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के पूर्वांचल का प्रमुख नगर आजमगढ़ विकास नए मार्ग पर बढ़ निकला है। इसके विकास में जिले के सठियांव स्थित द किसान सहकारी चीनी मिल्स लिमिटेड का बड़ा योगदान है। इस अत्याधुनिक चीनी मिल के महाप्रबंधक जी के अब्रॉल केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की योगी सरकार को चीनी मिलों को मजबूत करने और किसानों को भी बकाया धनराशि दिलाने की दिशा में कारगर काम करने को चीनी व गन्ना क्षेत्र के लिए शुभ मानते हैं। हालांकि इस अंचल में दुर्गम पारिस्थितिकी के बीच यह चीनी मिल जिस तरह से प्रगति कर रही है, वह जिले के लिए और किसानों के लिए बहुत सकारात्मक बात है। दरअसल, कभी यहां सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध ना होने की वजह से किसानों का गन्ना खेती से विलगाव और पुरानी टेक्नोलॉजी आदि के चलते यह चीनी मिल वर्ष 2006 से 2015 तक कुल 10 साल तक बंद रही। इसके बाद, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस होने के बाद महाप्रबंधक जी.के. अब्रॉल ने किसानों के हित में नई रणनीति के साथ इस चुनौती को स्वीकारा कि प्रगति के सोपान पर किसान व मिल दोनों को ले चलना है । 2016 में गन्ना उत्पादक किसानों को यह भरोसा दिलाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी कि चीनी मिल परस्पर लाभ में जुट कर किसानों के हितों को ध्यान में रखकर काम शुरू करने जा रही है। श्री अब्रॉल स्वीकारते हैं कि इसके लिए 2014-15 में गन्ना बुवाई के लिए किसानों को मनाने का कठिन अभियान शुरू किया गयाउधर, साथ ही साथ 231 करोड़ रुपए खर्च करके 11 माह में नया प्लांट भी लगाया गया, लेकिन किसानों में ज्यादा से ज्यादा भरोसा जगाने के लिए 27 मार्च से 2 अप्रैल 2016 के इन केवल 7 दिनों में किसानों से 82,000 कुंतल गन्ना खरीदा गया। इससे किसानों में भरोसा जगा और 2016-17 के पेराई सत्र में 24 लाख 3 हजार क्विंटल गन्ना खरीदा गया। अपनी ओर से किसानों को सुविधाएं, तकनीक व संसाधन ज्यादा मुहैया कराने शुरू कर दिए गए तो पेराई सत्र 2017-18 में 34 लाख 64 हजार क्विंटल और पेराई सत्र 2018-19 में 42 लाख 67 हजार क्विंटल गन्ना खरीद हुई। वर्ष 2019-20 में 50 लाख क्विंटल गन्ना मिलने की उम्मीद है।


      आजमगढ़ जनपद की आर्थिक प्रगति के जो तरीके हो सकते हैं, उसमें यह चीनी मिल एक बहुत बड़ा माध्यम बन चुकी है। हालांकि जिले के 70 फीसदी किसान छोटी जोतों के किसान हैं और वह गेहूं की फसल काटने के बाद ही गन्ना बोते हैं । इधर, अप्रैल से 15 मई के बीच गेहूं कटाई की प्रवृत्ति होने की वजह से गन्ने की खेती में विलंब होता है।


        साथ ही, पेड़ी का भी उपयोग न करने की यहां के किसानों की आम मानसिकता की वजह से भी किसान स्वयं को ज्यादा लाभ नहीं दे पाते । फिर भी, सरकारी व सहकारी प्रयास इन किसानों के लिए निरंतर चलते रहते हैं। वह तब, जबकि इस चीनी मिल के पास के दो विकासखंड सठियांव और पलनी श्डार्क जोन घोषित हैं अर्थात इन दोनों ब्लॉकों में निजी क्या बल्कि सरकारी बोरिंग भी अब नहीं हो सकती क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में भूगर्भ जल स्तर बहुत नीचे जा चुका है। सिंचाई के लिए ऐसी विषम परिस्थिति में भी सठियांव चीनी मिल किसानों के बीच गन्ना उत्पादन के लिए न केवल प्रेरित कर रहा है, बल्कि उन्हें अन्य सुविधाएं भी प्रदान कर रहा है। एक सौ से ज्यादा कृषि उपकरण टॅच को 50 फीसदी सब्सिडी पर दे चुका है । गन्ने की पौध बोने वाले किसानों को खाद व कीटनाशक भी बाजार मूल्य से कम मूल्य पर उपलब्ध कराता है । कुल 2412 गांव के किसानों को आच्छादित करने वाली यह मिल अपनी क्षमता के अनुरूप गन्ना प्राप्ति के लिए ज्यादा धन खर्च करके भी 120 किलोमीटर दूर चंदौली के औराई से भी गन्ना मंगाता है।


      साथ ही, गाजीपुर के नंदगंज व जौनपुर के शाहगंज में इलेक्ट्रॉनिक तुलाई केंद्र स्थापित करके गन्ना मंगाता है। इतनी दूर से गन्ना खरीद कर चीनी मिल पर व्यय भार ज्यादा बैठता है लेकिन प्रदेश के पूर्वांचल में किसानों को इस नगदी फसल के उत्पादन से लाभ मिले, इस विचार से यह सहकारी मिल काम कर रही है।